VarLakshmi Vrat Katha in Hindi PDF | वरलक्ष्मी व्रत 2026
वरलक्ष्मी व्रत कथा: पूजन विधि, महत्व, लाभ और संपूर्ण जानकारी
वरलक्ष्मी व्रत हिंदू धर्म में माता महालक्ष्मी को समर्पित एक अत्यंत पवित्र व्रत है। दक्षिण भारत में यह व्रत विशेष श्रद्धा के साथ मनाया जाता है, लेकिन आज पूरे भारत में इसकी लोकप्रियता बढ़ रही है। “वरलक्ष्मी” का अर्थ है ऐसी लक्ष्मी जो अपने भक्तों को इच्छित वरदान प्रदान करती हैं। इस दिन विवाहित महिलाएं अपने परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य, सौभाग्य और धन-संपत्ति की वृद्धि के लिए व्रत रखती हैं।
पौराणिक मान्यता के अनुसार माता लक्ष्मी ने स्वयं इस व्रत का महत्व बताया था और कहा था कि जो भक्त श्रद्धा से यह व्रत करता है उसे अष्टलक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
वरलक्ष्मी व्रत क्या है?
वरलक्ष्मी व्रत माता महालक्ष्मी की विशेष आराधना का व्रत है। इस दिन देवी लक्ष्मी को कलश रूप में स्थापित कर विधिपूर्वक पूजा की जाती है तथा वरलक्ष्मी व्रत कथा का श्रवण या पाठ किया जाता है। यह व्रत विशेष रूप से सौभाग्य, समृद्धि, धन, परिवार की उन्नति और सुख-शांति के लिए किया जाता है।
वरलक्ष्मी व्रत 2026 कब है?
वर्ष 2026 में वरलक्ष्मी व्रत शुक्रवार, 28 अगस्त 2026 को मनाया जाएगा।
शुभ मुहूर्त
प्रातःकाल (सिंह लग्न):
06:23 AM से 07:48 AM
दोपहर (वृश्चिक लग्न):
12:06 PM से 02:20 PM
सायंकाल (कुंभ लग्न):
06:16 PM से 07:52 PM
इन समयों में कलश स्थापना और माता लक्ष्मी की पूजा करना शुभ माना जाता है।
वरलक्ष्मी व्रत कैसे करें?
1. प्रातः स्नान करें
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
2. पूजा स्थान तैयार करें
पूजा स्थल को साफ करके रंगोली बनाएं और चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाएं।
3. कलश स्थापना करें
जल से भरा कलश स्थापित करें। उस पर आम के पत्ते और नारियल रखें। कलश पर माता लक्ष्मी का मुख या चित्र स्थापित किया जा सकता है।
4. संकल्प लें
परिवार की सुख-समृद्धि और कल्याण के लिए व्रत का संकल्प लें।
5. पूजन करें
माता लक्ष्मी को कुमकुम, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, फल और नैवेद्य अर्पित करें।
6. व्रत कथा पढ़ें
वरलक्ष्मी व्रत कथा का पाठ या श्रवण करें।
7. आरती करें
अंत में माता लक्ष्मी की आरती करें और प्रसाद वितरित करें।
VarLaxmi Vrat Katha in Hindi |वरलक्ष्मी व्रत कथा
वरलक्ष्मी व्रत की कथा एक बार महादेव शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी । इस व्रत को करने से स्त्रियों को सौभाग्य तथा समृद्धि की प्राप्ति होती है । आज के दिन वर को प्रदान करने वाली वरलक्ष्मी देवी की आराधना करी जाती है । यह व्रत श्रवण मास की पूर्णमासी से पहले आने वाले शुक्रवार के दिन रखा जाता है ।
एक बार मगध देश में कुण्डी नाम का नगर था । इस नगर का निर्माण स्वर्ण से हुआ था । इस नगर में एक स्त्री चारुमती रहती थी । जो कि अपने पति, सास ससुर की सेवा करके एक आदर्श स्त्री का जीवन व्यतीत करती थी । देवी लक्ष्मी चारुमती से बहुत ही प्रसन्न रहती थी । एक रात्रि को स्वप्न में देवी लक्ष्मी ने चारुमती को दर्शन दिए था उसे वरलक्ष्मी व्रत रखने के लिए कहा ।
चारुमती तथा उसके पड़ोस में रहने वाली सभी स्त्रियों ने श्रावण पूर्णमासी से पहले वाले शुक्रवार के दिन दिवि लक्ष्मी द्वारा बताई गयी विधि से वरलक्ष्मी व्रत को रखा । पूजन के पश्चात कलश की परिक्रमा करते ही उन सभी के शरीर विभिन्न स्वर्ण आभूषणों से सज गए । उनके घर भी स्वर्ण के बन गए तथा उनके घर पर गाय, घोड़े, हाथी आदि वाहन आ गए । उन सभी ने चारुमती की प्रशंसा करी क्यूंकि उसने सभी को व्रत रखने को कहा जिससे सभी को सुख समृद्धि की प्राप्ति हुई । कालान्तर में सभी नगर वासियों को इसी व्रत को रखने से सामान समृद्धि की प्राप्ति हो गयी ।
इस वरलक्ष्मी व्रत को रखने से तथा अन्य लोगो को भी बताने से या मात्र इस व्रत की कथा सुनने से ही माँ लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है ।
वरलक्ष्मी व्रत का अर्थ
“वर” का अर्थ है वरदान और “लक्ष्मी” का अर्थ है समृद्धि एवं सौभाग्य की देवी। इस प्रकार वरलक्ष्मी व्रत का अर्थ है ऐसी देवी लक्ष्मी की पूजा जो भक्तों को मनोवांछित वरदान प्रदान करती हैं।
वरलक्ष्मी व्रत का महत्व
शास्त्रों में कहा गया है कि यह व्रत अष्टलक्ष्मी की उपासना के समान फल देने वाला माना जाता है। यह केवल धन प्राप्ति का साधन नहीं, बल्कि परिवार की सुख-शांति, स्वास्थ्य, सौभाग्य और आध्यात्मिक उन्नति का भी प्रतीक है।
वरलक्ष्मी व्रत के लाभ
परिवार में सुख और शांति बनी रहती है।
धन और समृद्धि में वृद्धि होती है।
वैवाहिक जीवन में सौहार्द बढ़ता है।
परिवार के सदस्यों की उन्नति की कामना पूरी होती है।
मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।
सौभाग्य और मंगलकारी फल प्राप्त होने की मान्यता है।
माता लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
माता वरलक्ष्मी को क्या अर्पित करें?
कमल पुष्प
लाल या गुलाबी फूल
कुमकुम
अक्षत
हल्दी
नारियल
फल
मिठाई
खीर
पंचामृत
सुपारी
पान
घी का दीपक
वरलक्ष्मी व्रत की अधिष्ठात्री देवी
इस व्रत की अधिष्ठात्री देवी माता वरलक्ष्मी हैं, जो माता महालक्ष्मी का ही एक विशेष स्वरूप मानी जाती हैं। उन्हें अष्टलक्ष्मी का संयुक्त स्वरूप भी कहा जाता है।
निष्कर्ष
वरलक्ष्मी व्रत माता महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने का एक अत्यंत पवित्र और मंगलकारी व्रत है। श्रद्धा, भक्ति और विधिपूर्वक किए गए इस व्रत से परिवार में सुख, शांति, सौभाग्य और समृद्धि का वास होने की मान्यता है। यह व्रत भक्तों को केवल भौतिक समृद्धि ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक संतोष और सकारात्मक जीवन दृष्टि भी प्रदान करता है।